
देहरादून। उत्तराखंड में 08 जून से शुरू हुई विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया ने प्रदेश के हजारों बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। 07 जुलाई तक चलने वाली इस प्रक्रिया के तहत मतदाताओं के गणना प्रपत्रों का वितरण, संग्रहण और ऑनलाइन अपलोडिंग का कार्य किया जाना है, लेकिन प्रशासनिक स्पष्टता के अभाव में बीएलओ भारी मानसिक दबाव का सामना कर रहे हैं।
शुरुआत में अधिकारियों की ओर से 17 जून तक गणना प्रपत्रों के 100 प्रतिशत वितरण का लक्ष्य तय किया गया। कई स्थानों पर वास्तविक परिस्थितियों की अनदेखी करते हुए हर हाल में शत-प्रतिशत वितरण का दबाव बनाया गया। बीएलओ ने दिन-रात मेहनत कर यह लक्ष्य पूरा भी किया, लेकिन अब उन पर फॉर्मों की ऑनलाइन अपलोडिंग का प्रतिशत बढ़ाने का नया दबाव बना दिया गया है।
जमीनी हकीकत यह है कि बड़ी संख्या में मतदाता घरों पर नहीं मिल रहे हैं, कई लोग दूसरे शहरों में रह रहे हैं, कुछ परिवार बाहर गए हुए हैं और अनेक लोग अभी तक भरे हुए प्रपत्र जमा नहीं कर पाए हैं। इन व्यावहारिक कठिनाइयों के बावजूद प्रशासनिक अधिकारी लगातार अपलोडिंग प्रतिशत बढ़ाने के निर्देश दे रहे हैं।
बीएलओ का कहना है कि उनसे ऐसे लक्ष्य पूरे करने की अपेक्षा की जा रही है, जो पूरी तरह उनके नियंत्रण में नहीं हैं। एक ओर उन्हें घर-घर जाकर फॉर्म एकत्रित करने पड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पोर्टल पर अपलोडिंग, रिपोर्टिंग और प्रतिदिन की समीक्षा बैठकों का दबाव अलग है। परिणामस्वरूप प्रदेश के अनेक बीएलओ मानसिक तनाव, चिंता और गहरे अवसाद की स्थिति में पहुंच गए हैं।
बीएलओ का कहना है कि यदि प्रशासन जमीनी परिस्थितियों को समझते हुए स्पष्ट और व्यावहारिक नीति नहीं बनाता, तो एसआईआर की यह प्रक्रिया कर्मचारियों के लिए भारी मानसिक और शारीरिक बोझ बन जाएगी। उन्होंने मांग की है कि अपलोडिंग के अव्यावहारिक लक्ष्यों के बजाय वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर कार्ययोजना बनाई जाए, ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़े कर्मचारियों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
